निनादों से बीबी
नहीं होती है , अब बात
झरने ,हवा, पता नहीं
अब हो गए है, क्यों शांत ?
हरे भरे पेड़
वन में हैं , जो खड़े
पंकज सरोवर में हैं, जो
खिले -अधखिले
सभी चुप हैं
मानों वे निनादों के मौन के साथ हैं।।
प्रकृति में यह अकस्मात ! संपरिवर्तन
कौतूहल का विषय है
अद्भुत और चौंकाने वाला है
गर्मी झुलसाने वाली है
मेघ दूर -दूर हैं
वसुंधरा सुखी पड़ी है
वन्य अभ्यारण्य के जीवों के
गले सुखे हैं
यद्धपि उनकी आंखों से
अभिलाषाएं परिलक्षित हो रही हैं
यद्धपि उनकी आंखों से
अभिलाषाएं परिलक्षित हो रहीं हैं।।
- मनोज सिन्हा
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