विदा हो जायेंगें
एक-एक कर
मन की धरा से
तारों सी यादें
आसमान शायद
मन से थोड़ा ऊपर है
जिसमें दिख रहे
शशि-प्रभा की
शीतल रश्मियां
ध्रुव तारा सदा से
अटल अपने जगह
कर रहा हमसे बातें
कह रहा ,देखो उस
जल धारा को , जो
निकल रही गंगोत्री से
सदियों से दे रही जीवन
पोस रही नाना संस्कृति को
नभ से बरसती हैं, नन्हीं बूंदें
मोतियां बन माला स्वरूप
इन्हीं के इर्द-गिर्द चक्रवत
रहता जीवन के फूल
आओ मिल कर हम बुने
सर्दियों के सम-समागम
खिलाएं गर्मियों में सर्दियों
के गुलाब, गेंदा और टुलिप
जो न हो संभव, उसे बनाएं
पाषाण पर अंकित कर
अमिट सुकर्मों की छाप
फिर करेंगें सूर्य की विकिरणों से
भूली-बिसरी बात।
फिर करेंगें सूर्य की विकिरणों
से हम बात
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X