आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

मधुर मिलाप

                
                                                         
                            जब भी मिले तुम
                                                                 
                            
एक कली खिल कर
पुष्प बनी
जब भी हंसे तुम
कुसुम से ढेर सारे
पराग झरे
जब भी समीप आए तुम
उमड़-घुमड़ कर बादल छाए
जब भी तुमने छुआ मुझे
झमा-झम मोटी बूंदों की भरमार हुई
मानों तुम कोई सखा नहीं हो
बल्कि हो प्रकृति के तुम सजीले राजदूत
बल्कि प्रकृति के तुम..... .
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर