जब भी मिले तुम
एक कली खिल कर
पुष्प बनी
जब भी हंसे तुम
कुसुम से ढेर सारे
पराग झरे
जब भी समीप आए तुम
उमड़-घुमड़ कर बादल छाए
जब भी तुमने छुआ मुझे
झमा-झम मोटी बूंदों की भरमार हुई
मानों तुम कोई सखा नहीं हो
बल्कि हो प्रकृति के तुम सजीले राजदूत
बल्कि प्रकृति के तुम..... .
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