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लहरें

                
                                                         
                            चंचल क्रीड़ा
                                                                 
                            
लहरों की
मचल रही है
सागर में
इंद्रधनुष सी
मेघ छाए हैं
सघन घनघोर
चारों ओर
आतुर है
बरस जाने को
मेघ बूंदें भी
मचल रही है
सागर के लहरों में
हिल- मिल जाने को
सागर के लहरों में
हिल- मिल जाने को।।

सीखा नहीं
लहरों ने
ठहर जाने को
गति है, इसकी भाषा
तीव्र प्रवाह में
लहरें पाती हैं
जीवन की अभिलाषा
जीवन की अभिलाषा।।

चंचल क्रीड़ा
लहरों की
मचल रही है
सागर में
इंद्रधनुष सी।।

टकराती हैं, लहरें
तट से बार बार
मिट कर पुनः
जीवन पा जाने को
ध्येय मात्र है,लहरों का
काल -काल से
इतिहास विजय का लिखने को।।

सृजन है
श्रृंगार उसका
प्रसंग है, प्रवाह उसका
क्षण- क्षण मिट कर
जीवन पा जाने को
क्षण- क्षण मिट कर
जीवन पा जाने को।।

चंचल क्रीड़ा
लहरों की
मचल रही
सागर पर
इंद्रधनुष सी।।
- मनोज सिन्हा
 
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एक वर्ष पहले

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