मुक्कमल है यहां
कहां कोई?
खामियां रह गई कभी
इस ओर
कभी उस ओर।।
जहां है
यहां वहां
आदमी है
शहर है
पर कोई
जुस्तजू नहीं।।
चलो बाकी रह गए
ख्वाहिशों में
रंग भर लेते हैं
सांसों का क्या ठिकाना
रहे या न रहे
चलो कुछ ख्वाबों को
मुक्कमल कर लेते हैं।।
बहरहाल हम
फिर गल कर लेते हैं
कल के शिकवे को
हल कर लेते हैं
फलसफा जिंदगी का
और बेहतर नहीं हो सकता
चलो फैसला दिल का
आज ही कर लेते हैं
राह है
पर हमराह कोई नहीं
चलो एक हमराह ढूंढ़ने की
कोशिश कर लेते हैं।।
- मनोज सिन्हा
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