क्षणभंगुर से
इस जीवन में
क्या हो परमतत्व
मुक्तिमार्ग का पथ
इच्छा-मोह से
आच्छादित मन-कर्म
देता है, वियोग सदा
लेकिन सुकर्मो का योगफल
जीवन को देता है, सुखद-संयोग
मन चाहता है, खिलना
उपवन के आंगन
दिल चाहता है, उड़ना
मन के आंगन
मन चाहता है, पाना
प्रकाश का समग्र-पथ।।
उसी पथ पर चल
श्रीराम से मिले थे
भक्त केवट अभिराम
वर्तमान संदर्भ यदि पा सके
केवट के समदृष्य सा भाव
तो कोई भी मिल सकता है
परमतत्व से
हे हरि!
श्रीराम से ।।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X