काव्य से मैनें कहा
गीतों में ढल गई हो
ढल कर न जाने कब?
संगीत बन गई हो।।
छंद -पद में पहले तुम
आबद्ध थी
अब मधुर गीत बन गई हो! तुम
भ्रमित रहा सदा, मैं
जब भाषित हुआ, तब पाया मैनें
न जाने कब, मन के आईनों से
उतर कर, चिर काल के लिए
मेरे नयनों से हो, मेरे हृदय में
बस गई हो तुम!
सुखद सी यह अनुभूति
स्मरित कराती है, समग्र संस्मृति
मुझमें कुछ इस तरह रच-बस गई हो
मानों वर्षा का नद में
नद का सागर में अंतर्मिलन
हो गया हो, समरस सा
तुम्हारी सरल सी प्रकृति
ढलती रहती है, निरंतर
मौलिकता में बार-बार
परस्पर एक दूजे में
खो जाने का समर्पण लिए।।
तेरा- मेरा नाता
सानिध्य है, जन्म जन्मांतर का
जैसे अनुप्रास ,उपमा,रूपक,
यमक, श्लेष, संदेह, उत्प्रेक्षा
वक्रोक्ति और अतिशयोक्ति
अलंकार हैं, साहित्य के।।
नदी का सागर से मिलन
साहित्य का गागर भरने जैसा है
यह रीत निरंतर है, अतीत से
अमर है सारे के सारे छंद -पद
कबीर, तुलसी, मीरा, महादेवी,
प्रसाद और पंत
सब में सब हैं, जिन्होंने भरा है
स्व-अंतरलेखनी से साहित्य में
हजारों विविध-विविध रंग
हजारों विविध- विविध रंग।।
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