आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

जल बूंदे

                
                                                         
                            बूंदों में जन्म लेकर
                                                                 
                            
विराट स्वरूप में आना है
मेरे जीवन का यह अनुक्रम
मिट कर भी कुछ दे जाना है।।

जीवन को जीवन देना
है, मेरा धर्म- कर्म
इस हेतु ही हुआ है
मेरे जन्म का अर्थ
लघु बूंद बन
मैं धरा पर आती हूं
फिर विशाल जल धारा बन
तुम्हारे समक्ष प्रस्तुत हो जाती हूं
फिर मैं ,नदी कहलाती हूं
फिर मैं ,नदी कहलाती हूं
बूंद- बूंद जल की बूंदें
रचती- बुनती जीवन को
बसाती अपने तट पर
सभ्यता और संस्कृति को।।

बूंदों में जन्म लेकर
विराट स्वरूप में आना है
मेरे जीवन का यह अनुक्रम
स्वयं मिट कर भी कुछ दे जाना है।।

विचलित नहीं होती मैं
कभी भी अपने पथ से
सदा अनवरत- निरंतर रहती हूं
अपने जीवन -वृत में
प्रकृति के नियमों से
कभी- कभी बंध जाती हूं
इस कारण ही कुछ विलंब से
वर्षा ऋतु में कभी -कभी आती हूं
मेरे असमय आने से
स्थिति हो जाती है, विषम सी
सूखा- अकाल पड़ जाता है
भू- मंडल के चतुर्दिक
त्राहिमाम मच जाता है
फिर अपने पथ अवसाद छोड़ जाता है।।

बूंदों में जन्म लेकर
विराट स्वरूप में आना है
मेरे जीवन का यह अनुक्रम
मिट कर भी कुछ दे जाना है
मेरे जीवन का यह अनुक्रम
मिट कर भी कुछ दे जाना है।।
-मनोज सिन्हा
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर