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हाशिए पर वो

                
                                                         
                            क्या क्या न हुआ
                                                                 
                            
खेतों में आज तक
भूख मिटाती रही
देश बढ़ाती रही
मिली आज तक
जितनी भी उपलब्धियां
आधार किसान ही रहे
स्तंभ मजदूर ही रहे
होने चाहिए थे
उनके लिए भी कुछ
लेकिन उनके वृद्धि
के प्रतिशत बढ़ते रहे
हुआ यूं! किसान
मजदूर में तब्दील होते गए
पसीने बहाए, प्रजातंत्र को मजबूत भी किया
लेकिन हाशिए ज्यादा कुछ
न नसीब उन्हें हुआ
आज तो वे आ गए वहां
खेड़ा में गांधीजी ने किया था, कभी
शंखनाद खेतीबारी के लिए
तब था, ब्रतानियों का साम्राज्यवाद
अब तो स्वतंत्र है, राष्ट्र
परंतु प्रजातंत्र में
बेहाल है किसान
बेहाल है किसान।।
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2 वर्ष पहले

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