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गांधी-जयंती

                
                                                         
                            लो मैं आ गया
                                                                 
                            
भारतवर्ष में
पुनः एक बार
1948 के बाद
364 दिन होता
है, मेरा प्रवास
दक्षिण अफ्रीका में
मैं रहता है
गिरमिटिया मजदूरों की
आधुनिक पीढ़ी के हृदय में।।

हां! एक दिन वर्ष में
आना पड़ता है, जन्मभूमि पर
राजघाट पर स्वीकारने राष्ट्र की श्रद्धा।।
हां! मैं जीवित किवदंती हूं
बहुत सारे संगोष्ठियों में मुझ पर
चर्चा, विचार , विमर्श होते रहते हैं
राष्ट्रपिता हूं, बलिदान मुझसे लिया गया
हे राम! कह उसे मैंने स्वीकार है
लेकिन मैं जीवित रहूंगा सदा
इस वतन की मिट्टी में
यद्धपि मैं प्रवास में रहता हूं।।

साम्राज्यवाद की पराकाष्ठा में भी
मैंने सत्य की मशाल जलाई
नस्लवाद, रंगभेद , क्रूरता के विरुद्ध मैंने आवाज उठाई।।

मेरा वनवास 21 वर्षों का था
वह भी सुदूर दक्षिण अफ्रीकी राष्ट्र में
फीनिक्स आश्रम, टॉलस्टाय फार्म
इंडियन ओपिनियन पत्रिका
स्थापित कर ,प्रकाशित कर
सत्य , शिक्षा और अहिंसा के अस्त्रों से
पराजित किया सारे काले कानूनों को
फिर भारत की स्वतंत्रता के लिए
गांधी युग और आप आमने- सामने खड़े है।
आज 2 अक्टूबर है
मैं सुबह ही यहां पहुंचा हूं
सारा दिन राष्ट्र के साथ बिताऊंगा।।
स्वाधीनता अमर रहे
जय हिंद।
- मनोज सिन्हा
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2 वर्ष पहले

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