नहीं चाहिए मुझे
द्वंदों का हार
मैं आलोकित हुआ हूं
पाकर शिक्षा का ज्ञान
उसका है, मुझे भान
चाहता हूं, निर्बाध स्वतंत्रता
खग _विचरण के समान
किसने देखा है उस योद्धा को
बांधा है, जिसने आसमान
ये दर्प नहीं
नहीं है, कोई अभिमान
मैं तो चाहता हूं
समरस संस्कारों से
जोड़ता रहूं, बिखरे
तिनके जैसे विचारों को
परंतु अक्षुण्ण रखना मेरा स्वाभिमान
देना साहस, भरना भाव
ताकि मैं तोड़ सकूं
द्वंदों के सारे प्रपत्र
ठुकरा सकूं, घृणा के समस्त
गुणधर्म और भेद!!
-मनोज
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