कहो द्रोण!तुम
जग से
बताओ तुम !प्रथमतः
मन से
हो ब्राह्मण तुम! पहले
या हो गुरु तुम !पहले।।
यद्धपि निपुण हो! तुम
शिक्षा- शास्त्र में सम्पूर्ण
प्रवीण हो धनुर्विद्या में समग्र
शब्दभेदी बाणों के प्रक्षेपास्त्र का
कौशल से भी अवगत हो, लेकिन
कुटविधा में भी दक्ष -निपुण से दिखते हो।।
परंतु! जान कर भी जानबूझकर
अवमानना गुरु शिष्य- पद परंपरा का करते हो
एकलव्य ने दान कर अंगूठा अपना ! तुम्हें मान शिष्य गुरु -पद का रखा
द्वापर युग में ही गुरुत्व परंपरा का
तिरस्कार कर
गुरु -पद परंपरा को! तुमने जग में शर्मशार किया
गुरु -पद परंपरा को! तुमने जग में
शर्मसार किया।।
- मनोज सिन्हा
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