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दर्पण

                
                                                         
                            यदि दर्पण न होता
                                                                 
                            
तो क्या होता?
न कोई सजता
न कोई संवरता
वृक्षों की तरह मानव भी
अपनी देह पर भालों को
उगते बढ़ते देखता।।

केश विन्यासों में
मिलता शिव- जटा का रूप
उलझा उलझा सा मिलता
मानव का रूप सौंदर्य
प्रसाधन सारे धूल फांकते
विज्ञापन हमें न झांकते।।

यद्धपि मन का दर्पण
मन में ही है, बसता
एक मन दूजे मन से कहता
बन जाओ तुम मेरा दर्पण
मैं बन जाऊंगा तेरा दर्पण
फिर बिखरे न होंगें केश विन्यास
सजे होंगें करीने से
हर सांध्य के वक्त
तुम्हारे आने की प्रतीक्षा में सतत
तुम्हारे आने की प्रतीक्षा में सतत।।
- मनोज सिन्हा
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2 वर्ष पहले

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