नग्न गाछ पर बैठा सुग्गा
बोल कुछ नहीं पाता है
उसी गाछ पर बैठा उल्लू
शिकार देख गाछ से उड़ जाता है।
ढूंढो कोयल को किस गात की
किस पात में है, छुपी हुई
दिखती नहीं नग्न आंखों से
परंतु! सुना जाती है, मीठी गीत मनोहारी।।
मैना भी प्रातः प्रातः नित्य
आंगन मे जोड़े में दिख जाती है
अकेला नहीं रहने का सुंदर संदेश
हमें नित्य सिखा जाती है ।।
गौरैया आज कल नहीं दिख रही
पहले वह दिख जाती थी, नित्य
आंगन में अन्न का दाना चुगती
हुई
शायद , वह हो गई है, नाराज
क्योंकि, नभ में खिंच गई है, बिजली, दूरभाष के असंख्य तार
तारों के तरंगों से वह, होती है, वह परेशान
तभी गौरैया छोड़ , शहर का आंगन
ले ली है, बन में वनवास
तभी गौरैया छोड़, शहर का आंगन
ले ली है, वन में वनवास।।
- मनोज सिन्हा
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