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बुलावा

                
                                                         
                            परिमल नही, पराग नहीं
                                                                 
                            
कल्पनाओं में मुझे विश्वास नहीं
मधुर पथ को याद रखा, परंतु
कर्तव्य पथ को कब-कहां भूला
कल तक कर रहा, था मैं
निजी कर्तव्यों का निर्वाह
आज पुनः निकलने की बारी है
सरहद मुझे बुला रही,
रुक जाने की कोई बात नहीं
राष्ट्र है तो, सब कुछ है
अब समर्पित हो जाने की तैयारी हैं।
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3 वर्ष पहले

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