बीज तुम हो आशा के दीप
भू -गर्भ में छिप कर भी जीवन का
जीवंत संदेश दे जाते हो
तिमिरांध घनेरी पलकों में
आभा -आलोक भर जाते हो
सृष्टि का आधार बन कर
तुम फैले हो धरा पर विस्तृत
तुमसे ही उद्भूत होता है , यह जीवन
पाता है, तुम्हीं से उपहार समस्त
तुम्हारे बिना तो यह जीवन नीरस होगा होगा,और होगा कल्पनातीत फिर अतीत भी क्या होगा?
फिर अतीत भी क्या होगा?
तुम हो शाश्वत श्रृंगार
जीवन का हो आधार -समग्र
तुम बिन धरा पर न संभव होगा
किसान - किसानी, न राजा और रानी
तुम हो तो सार -अभिसार
इस जीवन का सारा -कुछ है
तुम हो तो , घने -तिमिर में भी गमनागमित है, जीवन का भोर
तुमसे ही प्राणित है, इस जग में
जीवन -वाटिका का कोलाहल
तुम्हीं हो बीज , आशा के हो दीप
तुझ्से ही मिटता , क्षुधा की ज्वाला समग्र
तुझसे ही मिटता ,क्षुधा की ज्वाला समग्र।।
-मनोज सिन्हा
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