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बदलते भाव

                
                                                         
                            घटता जा रहा
                                                                 
                            
नित्य क्षण- क्षण
दिवस- माह -वर्ष
बढ़ता अब कुछ
नहीं,रिक्त होता
जा रहा हृदय
सन्नाटे को भर कर
दूर होता जा रहा
प्रतिपल प्रेम रस
यद्धपि नितांत नहीं
घोलें प्रेम में करुणा का भाव रस
फिर भी न जाने क्यूं?
बहका है ,मन चला
जा रहा उस ओर
जहां रहता है,रेत
अपना सूनेपन का
घर बना कर
अवाक हूं, बदलते
क्षण, बदलते लोग
को देख कर
अंततः विलीन होना है,
सभी को
जल, वायु ,नभ
पृथ्वी,पावक से
मिल कर
जल, वायु, नभ
पृथ्वी, पावक
से मिल कर। 

- मनोज सिन्हा
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एक वर्ष पहले

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