आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

अवचेतन की पुकार

                
                                                         
                            सहम-सहम कर
                                                                 
                            
आते हैं, स्वप्न भी
मैं, देख रहा हूं
एक ही स्वप्न,
बार-बार
कई दिनों से
पूर्ण होने से पूर्व
खुल जाती हैं, पलकें
और मेरा स्वप्न
अधूरा ही रह जाता है।।
महसूस करता हूं,
संभवतः स्वप्न को
सींचना होगा
मन के भावों से
जोड़ना होगा, उसे
ह्रदय के तारों से
आमंत्रित करना होगा, उसे
प्रेम के पुकारों से
मन कहता है
मान जायेगा वह
और आएगा चुपके से, वह
तीसरे पहर
जब नींद के आग़ोश में
बंद होंगें नैन
फिर पूरे होंगें
स्वप्न के शेष बंध-उपबंध।।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर