मिलते रहना राहों में
मानो महसूस हो
ज़िन्दगी चल रही
कदम-तालों सी
रूक जाना भी
कोई बात होगी?
पहाड़ों से देखा है, हमने
अलकनंदा, भागीरथी,
गंगा-जमुना को उतरते हुए
रुकीं कहां सारी नदियां
बह कर, दे रहीं है, जीवन
सतत, निरंतर, अविरल
स्वयं का स्वरूप बदलने से पूर्व
सागर में मिल जाने से पूर्व
पुनः मेघ बनने तक
चक्रवत बह रही निरंतर
यही तो मर्म है, जीवन का
रूक न जाने और बहते रहने का
रूक न जाने और बहते रहने का।।
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