तुझमें बसता
राग- अनुराग
जीवन के
समस्त भावों का
तुझसे ही होता
अंतर में मुग्ध गान
स्निग्ध प्राणों का
दुःख वेदना
आते जाते
अपने अनुक्रम
क्या चिर -सुख
क्या चिर -दुःख
कभी कभी
भ्रम -विभ्रम होता मन में
पुनः मिट जाता है, तम समग्र
जब प्रज्वलित होता है, दीप अंतर में
तब रहता नहीं, कहीं अंधेरा
अंतस हो या हो प्रकाश का घेरा
सब उसका है, ना तेरा ना मेरा
सब उसका है, ना तेरा ना मेरा।।
- मनोज सिन्हा
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