मन के नीचे
मन के ऊपर
बसता तू ही, तू है
विविध स्वरूपों में
आ कर तुम
भर जाते हो
प्रेम-प्रीति के अदभुत भाव
गाते हो नेह के मंगल गान
नभ से सागर तक
प्रकृति से बटोर कर
अनुपम विहंगम छटाएं
हमारे जीवन के विविध में
तुम, अंकित कर जाते हो
मानों तुम हो! ऋतुरोहित
मेरी स्मृति में छोड़ कर
सप्तवर्ण के चिन्ह
न जाने कहां ? तुम
खो जाते हो
न जाने कहां? तुम
खो जाते हो।।
- मनोज सिन्हा
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