घन में छिप कर
शशि ओझल हो जाता
बार-बार
पुनः निकल घन से
विहंसता शशि बार-बार
शशि घन की आंख मिचौली
चलती रहती निरंतर निर्बाध
मानो छुआ-छुई खेल चल रहा हो
शशि घन का बचपन हर बार
शशि घन का बचपन हर बार.....
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