रुख़सत का वो मंज़र आज भी साँसों में ठहरा है,
हँसता हुआ चेहरा मेरा,अंदर से टूट कर बिखरा है।।
तेरे बिना ये शामें भी सिसकियाँ भरती रहती हैं,
आज हर दीपक की लौ में जैसे तेरा नाम उतरा है।।
मैंने हर ख़्वाब को सीने से धीरे-धीरे रुखसत किया,
पर एक तेरा ख़्वाब है, जो मेरे आँखों में ही उतरा है।।
लौट आओ तो कह दूँ, जो लफ़्ज़ कभी कह न सका,
अब ख़ामोशी की क़ैद में हर एक अरमान खड़ा है।।
जिस दिन तूने मुझे छोड़ा था, उसी दिन मर गया मैं ,
बस साँसों का चलना ही अब ज़िंदा होने का नाता है।।
रुख़सत कोई लम्हा नहीं, ये मोहब्बत का एक रोग है,
जो लगा तो हर मौसम में सदा, बस दर्द ही गहरा है।।
-एम के सिंह
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