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माँ और खाना

                
                                                         
                            माँ
                                                                 
                            
जब मैं स्कूल से खाने से भरा डिब्बा लेकर लौटा
तो तुमने मुझ पर गुस्सा किया
और मेने बड़ी आसानी से कह दिया "मुझे खाना अच्छा नहीं लगा "
तुम थोड़ा मायूस हुई,
शायद तुमने मन ही मन खुद को कोसा भी होगा कि क्यों तुम मेरी पसंद का खाना नहीं बना सकीं

ऐसा नही है कि मेने कभी खाने की तारीफ नहीं की
बहुत दफा में खाली डिब्बा लेकर घर लोटा और मेने कहा
"माँ आज खाना बहुत अच्छा था "
पर तब भी तुमने खुद को शाबासी नहीं दी बल्कि मेरा माथा चूमा और मुझे प्यार किया

मैं अक्सर सोचा करता हूँ घंटों रसोई में मेहनत करने के बाद भी अगर हम तुम्हें कहते खाने में नमक कम है-ज्यादा है तीखा है-नहीं है तो क्यूँ तुम हमसे कुछ नहीं कहती
शायद इसलिए कि तुम औरत हो
और औरतें सिर्फ प्यार करना जानती हैं
और तुम औरत तब बनी होगी ना जब पहली बार मेने तुम्हे माँ कहा?

आज में घर से दूर हूँ हर रोज तुमसे मिलने वाले प्यार से दूर
यहाँ खाना भी अच्छा नहीं होता
अभी कुछ दिनों के लिये जब मैं घर आया था,
तब मैं चाहता था
तुम्हें कस के गले लगाना और कहना
"माँ क्या तुम्हें पता है तुम दुनिया का सबसे अच्छा खाना बनती हो "
लेकिन मैं नहीं कह पाया ना जाने क्यों
कह देना चाहिए था
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एक महीने पहले

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