तुमने समझा कभी उनका जीवन सफ़र |
खेत में है बने उनके छोटे घर ||
चाहते वो नहीं उनको दौलत मिले ,
हैसियत से भी ज्यादा शोहरत मिले |
फिर भी रहते नहीं कोई शिकवे गिले ,
ऐशी है उनके जीवन की शाम ओ शहर ||
तुमने समझा कभी.........
रात हो या दिन हो रहते खेतों में पड़े ,
छांव हो या धूप रहते हर पल खड़े |
उनके पैरो में लाखो है छाले पड़े,
ऐसी है उनके जीवन की मुस्किल डगर ||
तुमने समझा कभी.........
जो भी पैदा किया थोडा सा रख लिया ,
ताकि जलाता रहे अपने घर का दिया |
खुश रहते है वो थोडा भी खा लिया ,
उनको मालूम नहीं क्या है लंच और डिनर||
तुमने समझा कभी.........
उनके रहने से कितनो को जीवन मिला ,
शहर से गांव तक फूल सा है खिला |
फिर भी मिलाता नहीं मेहनत का शिला ,
ऐसी अंजान सी कटती उनकी उमर ||
तुमने समझा कभी.........
डॉ. मनमोहन सिंह राजपूत
B.Sc.,B.V.Sc.& A.H.,M.V.Sc.
Mo No - 8793781481
Email -drmohanrajput@gmail.com
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