दूरी है तन्हाई है
अपनों से मिलने की ख्वाहिश है
सामने खड़ी मेरी परछाई है
जो मुझे रोक रही है क्यों मिलना है तुम्हें
उनसे मिलना है तुम्हें जो अपने हो कर भी
अपनो को न समझता है
मत मिलो इनसे ये अपनो से भी पराए हैं
कैसे न मिलूं आखिर अपने तो अपने होते हैं
चाहें वो हमें समझे या ना समझें
एक रिश्ता तो उनसे है न ।।
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