मन से मन को मन माफ करें जो,
मन से मन को पाख करें जो।
मन से मन के दर्पण को अर्पित करतें दें,
मन की सब पीड़ा,
पीड़ा बन जायें मन की क्रीड़ा।
उस मन के मन को पाऊं कहां मैं,
मन की इस दुविधा को मन से कैसे छुपाऊं मैं।
मन हीं मन मे मन न रहा जब जीवन मे,
मन बिन ये तन कहां तक बजाऊं मैं।
- मंजू मंजुला
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