मन में जलन
जिह्वा पे दंश
ह्रदय में विष
लिए फिरते हो
सर्प हो सर्प
बन कर डसो
साधु बन कर
क्यों फिरते हो।
मं शर्मा (रज़ा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X