दूषित वायु
उद्वेलित मन है
अनगिनत प्रश्न
व्यथित जन हैं
झूठ का ईंधन
बेदम जीवन है
वक्त से निष्कासित
सच का चलन है।
-मं शर्मा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X