कुछ सुलझे कुछ उलझाए से
रेशम की तरह नरमाए से
बड़े नेह से बाँधे तुम संग
मोह से मोह के धागे थे
क्यों भावनाओं से खेल गए
मन नेह-नीर से भीग गए
कच्चे धागे कच्चे पड़ कर
मोह बंधन से छूट गए ।
-मं शर्मा
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