हर घर के आँगन में
हर छत की मुँडेर पर
चाँदनी बिखेरता चाँद
दूर से इतराता रहा
चाहा था सबने मगर
किसी का न हो सका
सबका उसे होना था
थोड़ा थोड़ा बँटता रहा।
-मं शर्मा
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