एक बहर के किनारे पर बैठे हैं हम
और हवा पूछती है कि कैसे हैं हम
फेंकने को तो सिक्का नहीं हाथ में
क्या कहें सब समेटे से बैठे हैं हम
तेरे शहर में उम्मीदों से बैठे हैं हम
तेरी चाहत के दंभ में ऐंठे हैं हम
एक पहर बीतता ना तेरे साथ में
क्या करें सब लपेटे से बैठे हैं हम
-मंजू
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