आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

दिल का दरवाज़ा

                
                                                         
                            दस्तक मत देना तुम दिल के दरवाजे पर
                                                                 
                            
लौट रहा हूँ मैं, खड़े रहना दरवाजे पर

कहीं किसी आहट से चौकन्ना सबेरा
सूरज बेटा मुंह धो रहा है दरवाजे पर

शोरगुल में कहीं खो गया दोपहर हमारा
धूप हवा अंदर आने हैं तेरे दरवाजे पर

डूब रहा मैदान समुन्दर पहाड़ के पीछे
रात से बहस जारी है मेरे दरवाजे पर

पत्तों वाली टहनियां बहाना ढूंढ रही हैं
मत रखना पहरेदार बंद दरवाजे पर

- मनीष यादव
हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
4 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर