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हम मजदूर मजबूर जरूर हैं साहब !

                
                                                         
                            हम मजदूर, मजबूर जरूर हैं साहब,
                                                                 
                            
पर आज भी जज्बे में खुद्दारी है-2

माना, इन फिजाओं में बिमारी है,
पर आज भी जज्बे में खुद्दारी है...

पर साहब!

हाथ में खाने का पैकट देकर, तस्वीर खींच लेना
मानो इज्ज़त छीन लेना,
ए कहाँ की समझदारी है?

साहब!

हम मजदूर मजबूर जरूर हैं साहब
पर बिखारी नहीं...

हम मजदूर मजबूर जरूर हैं साहब!
पर आज जज्बे भी जज्बे में खुद्दारी है
आज भी जज्बे में खुद्दारी है।।

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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6 वर्ष पहले

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