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कर्म का मोल

                
                                                         
                            कर्म उपदेश जो देते है,
                                                                 
                            
कौन सी नाव वो खेते है,

जो कल तक, भटक रहे जग में,
आज मुश्किल से वो, चेते है!

संकीर्ण रहे जो जीवन भर,
जिन्हें रहा कभी न, कोई सबर!

वो गीता का देते, उपहार,
जो कल तक, मिथ्या करें, प्रचार!

जो मोक्ष मार्ग बतलाते है,
वो स्वयं को ही, झुठलाते हैं!

क्या! कर्म में निहित नहीं जीवन,
फिर क्यों हो भटकते, निर्जन वन!

उपदेश कर्म का भाग नहीं,
ये विरह है, कोई राग नहीं!

कर्तव्यच्युत हैं, मृत्यु तुल्य,
कर्म से बड़ा न जीवन मूल्य!

कर्म नहीं, संकीर्ण विधान,
अयंनिजःपरोवेति, कर्म का नहीं है, ये संविधान!
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एक वर्ष पहले

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