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करीब आयें है

                
                                                         
                            सुबह बताएगी, हुज़ूर! रात क्या गुल खिलाये है,
                                                                 
                            
आज मुद्दतों बाद, हमारी बात पर, वो मुकुराएँ है!!

वो भी, ज़ुल्म ए जिंदगी के, जरूर सताये है,
तभी फुरसत ए सुकूँ मे, मेरे करीब आये है!!

दूर थे, तो बड़े बेचैन और बेताब थे, हम,
आज करीब आये, तो लगता है, जान जाए है!!

निगाह ए यार ने दिये है, ज़ख़्म इतने,
जितने, सारी उम्र, किसी दुश्मन ने ना लगाएं है!!

जिस चाँद की थी आरजू, बे इंतेहा हमें,
वो चाँद बे तकल्लुफ् हो, मेरे दिल मे, उतर आयें है!
-मृदुल मनीष
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

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