जीवन का दरख़्त कभी, लह लहा न सका!
जड़े थी, गाँव मे, कहीं दूर!
शहर मे, कह कहे, लगा न सका!
उस मिट्टी मे कुछ तो था, खाश!
अपनापन कहीं और वो, पा न सका!
सुनहली धूप, छन के आती थी, गोढवूल् के पेड़ों से!
वो सुबह, आज भी, भुला न सका!
जिन गलियों मे, बीता बचपन,
उससे अलग, स्वयं को कभी, पा न सका!
कृत्रिम रौशनी के साये मे, लिपटी, शहर की जिंदगी!
जिंदगी है, या भ्रम, कभी कोई, बतला न सका!
जड़ों से दूर, सुख गया, जीवन का पौध
प्यास इतनी, दौलत का समंदर भी, बुझा न सका!!
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