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हमारी बेगम

                
                                                         
                            देर से सुबह उठी है,
                                                                 
                            
बेगम हमारी, आज रूठी है,

चेहरे से था, नूर वो गायब,
चाल, ढाल तक बदल गए, अब,

चढ़ी तैयारियां, उलझे बाल
जंग की मानो, ठोके ताल,

माथे पे थी, चंद लकीरें
मेरा सीना, जोर से चीरे

मेरी सिट्टी, पीटी गुम थी,
उनके हाथ, अब मेरी दुम थी,

बड़े अदब से दी, आवाज
शामत आई, मेरी आज,

घर के बर्तन लगे, नाचने
लहू निकाला, मर्तबान के कांच ने,

फटा जो देखा, मेरा सर
उनका गुस्सा, गया उतर,

बैठी मरहम, पट्टी करने
छाती पीट के लगी, वो मरने

मोती जैसे आंसू, झरते
हम अवाक, भला क्या, करते,

बड़े प्यार से, गले लगाया,
सारे दर्द, एक झटके में भगाया,

काश! हर रोज वो, ऐसे ही रूठे,
हां! मगर, अपना सर ना फूटे,

गुस्से में और भी, लगती प्यारी,
बड़ी अजीब, बेगम है, हमारी।
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एक वर्ष पहले

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