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गली के कुत्ते

                
                                                         
                            मेरी गली के रसिक हैं, कुत्ते
                                                                 
                            
गाते राग, दरबारी,

सुर होते, इतने सटीक,
नींद भाग जाती, हमारी।

कभी, कभी सुनाते हैं, विरह की ऐसी, गाथा,
विह्वल हो कर भावुक मन से, पकड़ लेते हैं, माथा।

हृदय अधीर हुआ जाता, जब करते वो, आवाज,
निद्रा रानी भागती उल्टे, छोड़ के अपना, काज!

डर के साये मे रात, गुजरती, जंहाई भी आँहे भरती,
सृजन, साहित्य सब हो जाए परती, कवि कल्पना भला कैसे निखरती!
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एक वर्ष पहले

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