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दुश्मनी

                
                                                         
                            मेरी दुश्मनी ने तुझे, जिंदा रखा है!
                                                                 
                            
वरना, तुझ में रखा क्या है!

जर्जर जिस्म, मानो खंडहर हो,
वीरान दिल है, फिर बचा क्या है!

ना ही खुश रहता है, ना खुशी, देखी जाती,
इससे बढ़कर, कोई सजा, क्या है!

ख्वाब लिए, बैठा है, की, हो जाऊ, बर्बाद,
मै तो तैयार हूं, तू बता, तेरी रजा क्या है।।

तू जो जिंदा रहे, तो दुश्मनी, कबूल मुझे,
यूं अकेले, जीने में, फिर, मजा क्या है।।
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एक वर्ष पहले

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