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बदले दिन

                
                                                         
                            बचपने में सोचता था, बड़ा होना है,
                                                                 
                            
अपने पैरों पे, खड़ा होना है!

मां की डांट, बाबूजी की फटकार
दादा, दादी, से भरा घर द्वार!

हरेक बात पे, टोका, टोकी,
मनाही, और खेलने की, रोका, रोकी!

सोचता था, कब बड़ा होऊंगा,
अपने तरीके से, जिंदगी जिऊंगा!

ना होगी, घर वालों की, दखल,
जहां सिर्फ चलेगी, मेरी अकल!

समय बीता, बड़ा हुआ,
संभव था जो, उन ऊंचाइयों को छुआ!

जिंदगी में अब किसी का दखल न रहा,
लेकिन जिंदगी का वो पुराना, शकल न रहा!

अब याद आते है, वो पुराने दिन,
महसूस होता है, अकेलापन, अपनो बिन!

दिल चाहता है, कोई टोके,
टीस हर पल, ये हृदय को भोंके!

अब अपने आते है, पास, सिर्फ जरूरत के वक्त,
जिंदगी हो गई है, बहुत सख्त!

ना वो दौर रहा, ना ही वो लोग,
जिंदगी बन गई, लाइलाज रोग!

वो बचपन बड़ा प्यारा था, रे!
सबका लाडला, दुलारा था, रे!
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एक वर्ष पहले

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