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अरमान

                
                                                         
                            किसी बात का रहा, नही कभी गुमान!
                                                                 
                            
तुच्छ कवि हूं, क्या करूँ मै अपना,
बखान!

जुड़ने का बस, शौक मुझे है,
उसी मे मेरी, आन और, शान!

सब समान, और सब योग्य है!
जमीं सभी की, सबका आसमान!

मृदुल वचन, कहने, सुनने से,
दिलों मे मिलता है, स्थान!

सबसे बड़ी है, जग मे, सेवा,
सेवा से बढ़कर नही, दान!

चाह है बस इतनी ही, मेरी
पेट भरा, और सर पे मकान!

साथ से सबके, बने कारवाँ,
मेरा बस, इतना अरमान!

सब हो सुखी इस दुनिया मे, यारों,
यत्न करे, बस ये है, आहवान!

आपके दिल मे, मेरा घर हो!
यही प्रार्थना, यही अजान!

-मृदुल मनीष
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
10 महीने पहले

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