एक स्त्री
एक स्त्री चाहे तो सृष्टि का सृजन भी कर सकती है,
और विनाश भी...!
स्त्री चाहे तो घर को स्वर्ग-सा सुंदर भी बना सकती है,
और अपनी कुरीतियों से कुरुक्षेत्र का मैदान भी...!
स्त्री चाहे तो पुरुषों को शिव भी बना सकती है,
उनके गलत से गलत राहों से,
उनको खींचकर वापस भी ला सकती है।
उनके अंतरात्मा में प्रेम का दीपक जला सकती है,
उनके जीवन को नया मार्ग दिखा सकती है।
और स्त्री ही चाहे तो पुरुष को शत्रु भी बना सकती है,
उनकी सारी भावनाएँ मिटा सकती है,
उनको राम से रावण भी बना सकती है...!
एक स्त्री, माता, बहन, पत्नी, पुत्री, अर्धांगिनी,
सबका रूप होती है।
स्त्री अपने स्वभाव से देवी का रूप कहलाती है,
और कुकर्मों से चांडालिन, राक्षसी, पिशाचनी
की संज्ञा भी पाती है...!
एक स्त्री पुरुषों की शक्ति, भक्ति, रीति, प्रीति,
काम, ज्ञान, मुक्ति का मार्ग होती है...!
एक स्त्री घर, गृहस्थी, परिवार, संसार बचाने के लिए
हर दुःख, हर दर्द, हर पीड़ा सह जाती है,
और जब इसी सृष्टि में कोई आग लगाता है,
तो वही स्त्री काली, महाकाली, विक्राली , दुर्गा,
रौद्ररूपिणी शक्ति बन जाती है।
शुंभ-निशुंभ, रक्तबीज, महिषासुर जैसे दानवों का
अस्तित्व मिटाती है...!
एक स्त्री हर सुख-दुःख में पुरुषों का साथ निभाती है,
पुरुषों के कदम से कदम मिलाकर संसार, नया युग,
नई पीढ़ी, नए समाज का निर्माण करती है...!
एक स्त्री सृष्टि का आधार होती है,
सृजन और विनाश दोनों की जिम्मेदार होती है...!
एक स्त्री...!!
-उर्वशी अमित मिश्रा
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