सिर्फ सांसों का आना जाना
तो जीना नहीं
जो जी रहे है क्या पता
वो जीना है भी या नहीं
पूरी शिद्दत से
जो ढूंढते है
मिल जाए
तो भी मिला क्यों नहीं
हसरतें पूरी होती
तो खूब है
पूरी होकर भी
चैन मिलता क्यों नहीं
हर रोज जिसे देखकर
नम हो जाती है आंखे
कमबख्त सामने
वो दिखता क्यों नहीं
बेगैरत ज़िंदगी
ठोकरों से जिंदा रखती है
उन ठोकरों से फारिग हो जाए
तो भी जिंदा क्यों नहीं
आशियाना सुबह बनाते है
अपनी आबरू का
शाम को बेइज्जती हो जाए
तो भी शिकवा क्यों नहीं
बेहोशी, बेईमानी, ज़लालत में
कौन सी जिंदगी
कश्मकश में डूबते रह गए
पर जिया कुछ भी नहीं
लो कहानी खत्म हुई
अब हमें यूं जीना नहीं....
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