कभी-कभी मन
खुद को ही नहीं समझ पाता
दूर जा जा कर
अतीत के यादों को
ढूंढ ढूंढ के लाता है
इतना नादान है
ये भी नहीं समझ पाता
आज जो गवां रहा है "अनमोल पल"
ये भी कल अतीत बन जाना है....
"ये वक्त" तू भी कल अतीत बन जाएगा
और मन अफ़सोस जताएगा
ये पागल मन समझाने पर भी समझता नहीं
"अतीत" तेरी यादों के बारिश में भींगना इसे
पसंद है
हंसते आंखों को नम करना इसकी फितरत है
क्या करूँ नादान मन है।।
-ममता तिवारी
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X