इत्र से किरदार महकता तो चरित्र की जरूरत क्या थी,
बैठें बैठें कामयाबी मिलती तो कर्म की जरूरत क्या थी।
बिना चले मंजिल करीब आ जाती तो चलने की जरूरत क्या थी,
अगर जिंदगी इतनी ही सरल, सुगम होती तो मुश्किल क्या थी।
-ममता तिवारी
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