आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

मन को खूब भाई रेल

                
                                                         
                            झुक झुक झुक झुक आई रेल
                                                                 
                            
मन को खूब भाई रेल
चलो देखने चलते है रेल
कर ले हम सभी आपस में मेल

मम्मी पापा जी से बोलेगें
हम सब दुनियां देखेंगे
मुन्नी बोली दादी जी से
दादी जी देखिए आई रेल

रेल के डिब्बे जोड़े हुए हैं
सभी लोग उसमे चढ़े हुए हैं
एसी स्लीपर जेनरल डिब्बे आपस में बांटे हुए हैं
एक दूसरे में सटे हुए हैं

सब स्टेशन पर रूकती है
अच्छी अच्छी चीजें बिकती है

घूमने हम सब जाएंगे
छुट्टियों मे खुशियां मनाएंगे
बहुत सुंदर रेलगाड़ी है
मन को खूब भाती है

तेजी से चलती है
मन को खूब हरती है

झुक झुक झुक झुक चलती रेल
चलो चले हो जाए न देर

आ गई है देखो रेल
कपड़ों का बैठा ले मेल
खूबसूरत लगेंगे ढेर
वहां खाएंगे चीजें ढेर

भेलपुरी, मिठाई सुंदर पेड़ा
नाशपाती संतरा सेव केला
खूब सुंदर हाेगा सवेरा
खुशियां भरपूर मिलेगा

खुशी खुशी हम आयेंगे
फिर स्कूल जाएंगे
दोस्तों को बताएंगे
उनको अगले साल ले जाएंगे
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
6 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर