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लिखती हूं

                
                                                         
                            प्रतिदिन खुद को लिखती हूं सुबह से उठकर
                                                                 
                            
रात होते–होते खुद ही खुद को मिटाने लगती हूं
अपने आप से मजबूर होकर,
हर दिन खुद ही सोचती हूं अपने वजूद को
दिन हफ्ते महीने ये सोचा करती हूं
फिर अपनो के लिए खुद ही खुद को भुला देती हूं
उनकी खुशियों के....
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7 महीने पहले

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