कुछ शब्द मन की खिड़की से
रोज़ झांकते हैं
पन्नों पर बिखरने के लिए
दिल की धड़कन बेताब रहती है
कागज़ से कुछ कहने के लिए
दिल की धड़कन बेकरार रहती है
कागज़ पर कुछ लिखने के लिए
कलम मचलती रहती है
शब्दों को सजाने के लिए
कुछ जज़्बात बेचैन हो उठते हैं
मन की कैद से बाहर निकल
खुली हवा में सांस लेने के लिए
कुछ एहसास तड़पते रहते हैं
स्याही की खुशबू पाने के लिए
कुछ भावनाएं भीतर ही भीतर
उछलतीं रहतीं हैं
मन की नगरी से निकल
दिल तक पहुंचने के लिए
कुछ शब्दों के सुमन
मन में खिल ही जाते हैं
खुशबू बिखेरने के लिए
कुछ शब्द मुस्कुरा ही उठते हैं
सबके जीवन में ख़ुशी के रंग
और मुस्कान भरने के लिए।।
-ममता तिवारी
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