किताबें कितनी शांत बैठी रहती है
चाहने वालों को मुकाम पर पहुंचा देती है।
हम इंसान कितना शोर करते है,
शांति पसंद किताबों से बोर हो जाते है।
बिना सोचे समझे,
अपने किस्मत की कुंजी,
से दूरी बना लेते है।
और अंत में परिणाम स्वरूप,
हम सब नादान,
इंसानों को गर्त नसीब होती है।
किताबे शांत है लेकिन वो
हमें चिल्ला चिल्ला कर,
आवाज देती है।
हममें इतनी शोर है,
हम उसकी चिल्लाहट भरी,
आवाज को सुन नहीं पाते है।
यही हमारी कमी,
हमें आम इंसान बना के छोड़ देती है।
किताबें शांत नहीं है,
वो बहुत शोर करती है,
वही हमारे जिंदगी में अजोर करती है,
किताबें हमदर्द और साथी है।
-ममता तिवारी
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